मुग़लसराय/चन्दौली । स्थानीय बाटी चोखा रेस्टोरेंट पर पिता संघटन द्वारा प्रेमचंद की 138वीं जयंती मनाई गई । इस अवसर पर गोष्ठी व कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया गया । गोष्ठी में रेलवे स्कूल के रिटायर्ड शिक्षक मोहन राय ने उनके बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि आम लोगों के बीच प्रेमचंद कहानीकार और उपन्यासकार के रूप में ही अधिक प्रसिद्ध हैं। साहित्य और प्रेमचंद में रुचि रखने वालों के अलावा बहुत कम ही लोग यह जानते हैं कि प्रेमचंद ने कई वैचारिक लेख भी लिखे हैं। प्रेमचंद केवल एक लेखक का नाम नहीं है, बल्कि वो एक विचार और साधना का नाम है, जिनके लिखा एक-एक शब्द दिलों पर दस्तक देता है और कण-कण में रोमांच भर देता है। उन्होंने बताया कि मुंशी प्रेमचंद का जन्म साल 1880 में 31 जुलाई को वाराणसी के एक छोटे से गांव लमही में हुआ था। मुंशी प्रेमचंद ने साल 1936 में अपना अंतिम उपन्यास गोदान लिखा। जो काफी चर्चित रहा। प्रेमचंद का मूल नाम धनपत राय था ।बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रेमचंद ने हिंदी से पहले उर्दू में लिखना शुरु किया था। जब धनपत आठ वर्ष के थे तब बीमारी के कारण इनकी मां का देहांत हो गया। इनका विवाह भी 15 साल की आयु में कर दिया गया था, मगर कुछ समय बाद ही उनकी पत्नी का देहांत हो गया।कुछ समय बाद उन्होंने बनारस के बाद चुनार के स्कूल में शिक्षक की नौकरी की, साथ ही बीए की पढ़ाई भी। बाद में उन्होंने एक बाल विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जिन्होंने प्रेमचंद की जीवनी लिखी थी। इस अवसर पर सतनाम सिंह, मोहन राय, विजय कुमार श्रीवास्तव, परमानंद यादव,चंद्रभूषण मिश्रा सहित अन्य लोग उपस्थित रहे । कार्यक्रम का संचालन कवि इद्रजीत निर्भीक ने किया ।
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