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Wednesday, November 10, 2021

आहार की शुद्धता से व्यवहार की शुद्धता होती है-महाराज जी

चकिया चन्दौली वनदेवी पतित पावन जो मंगल का भी मंगल करें जो मन को निर्मल करके भगवान के शरणागति के योग्य बना दें ऐसी अविचल अविरल धारा से बह रही श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान गंगा में आज महाराज जी ने भगवान श्री सुखदेव का ध्यान करते हुए साधन के नियमों का वर्णन में अष्टांग योग का वर्णन किया और हार पर विशेष ध्यान देने की बात कही। क्योंकि जैसा हमारा आहार होगा वैसा ही हमारा विचार होगा और जैसा विचार होगा उसी प्रकार हमारा व्यवहार होगा। अतः आहार की शुद्धता से व्यवहार की शुद्धता होती है और जब तक मन शुद्ध नहीं होगा तब तक भजन में मन लगना असंभव है। यह मन चंचल होता है जीव हत्या पर महाराज जी ने कहा कि सभी जीव परमात्मा के द्वारा बनाए गए हैं हमें उन्हें बनाने का अधिकार नहीं है तो उन्हें नष्ट करने का अधिकार भी नहीं है।अतः अपने स्वार्थ एवं स्वाद के लिए किसी भी जीव की हत्या यह पाप है। इस पाप से बचें जीवन में प्रयास होना चाहिए कि किसी भी जीव को किसी भी व्यक्ति के द्वारा दुख ना पहुंचे यह सबसे बड़ा भजन है। कलयुग का प्रभाव चार स्थानों पर विशेष होता है जुआ, मदिरापान, परस्त्री गमन एवं पशुओं की हत्या जहां पर होती है वहां साक्षात कलयुग प्रकट रूप में रहते हैं।इसलिए कलयुग के पापों से बचना है तो इन चार स्थानों से बच के रहना चाहिए।आहार व्यवहार एवं विचार को पवित्र रखते हुए परमात्मा की तरफ जीव बड़े तो निश्चित ही परमात्मा के दर्शन होते हैं। महावीर सेवा समिति द्वारा आयोजित भागवत कथा में मुख्य रूप से कथा आयोजक व्यास ओम प्रकाश पांडे, राजीव पाठक पूर्व प्रधान सिकंदरपुर, शीतला प्रसाद केसरी अध्यक्ष सिकंदरपुर उद्योग व्यापार मंडल, सियाराम गुप्ता, जितेंद्र कुमार, हौसला प्रजापति, बल्ली पाल, श्रीपति यादव, दुलारे यादव,गुलाब पाल आदि लोग उपस्थित थे कार्यक्रम का संचालन राजेश विश्वकर्मा ने किया।






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