श्याम सिंह ‘पंवार’ कानपुर नगर
कानपुर लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर पहरा देने वाले जब सच की तलाश में निकलते हैं, तो उन्हें उम्मीद होती है कि तंत्र (सिस्टम) पारदर्शी होगा, अधिकारी जिम्मेदार होंगे और अपराध के खिलाफ जंग में वे एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। लेकिन आज के दौर में कड़वी सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। जब कोई पत्रकार किसी आपराधिक कृत्य की तह तक पहुंचने के लिए सम्बंधित अधिकारी से पक्ष जानने या सत्यापन (वेरीफिकेशन) करने की कोशिश करता है, तो सम्बंधित अधिकारी ही अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय ‘कुछ’ के चक्कर में अपराधियों के लिये ‘गुप्तचर’ बन जाते हैं।
यह बेहद शर्मनाक और चिन्ताजनक परिपाटी है, जहाँ अधिकारी बिना एक पल गंवाए अपने सगे अपराधी को फोन घुमाकर यह बता देते हैं कि, ‘‘फलां पत्रकार तुम्हारे कारनामों की कुंडली खंगाल रहा है।’’ अर्थात उस पर कार्रवाई करने के बजाय उसे सतर्क करने की भूमिका अदा कर देते हैं।
कानून के रखवालों का ‘गैंगस्टर प्रेम’ शायद इसे ही कहा जाता है, क्योंकि जिन कुर्सियों पर बैठकर अधिकारियों को शातिर अपराधियों के मन में खौफ पैदा करना चाहिए, वे आज अपराधियों को ‘सुरक्षा कवच’ और ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ मुहैया करा रहे हैं। क्या, यह देश के संविधान और कानून के साथ गद्दारी और आम जनता के साथ धोखाधड़ी नहीं है ?
वहीं ऐसे ही सफेदपोश अधिकारी, शातिर किस्म के लोगों को सबूत मिटाने और गवाह डराने की खुली छूट दिलवाने की भूमिका अदा कर रहें हैं, ऐसा इस लिये कहा जा सकता है क्योंकि, जब अपराधी को पहले ही पता चल जा रहा है कि, ‘मीडिया या कानून उस तक पहुंचने वाला है, तो वह फौरन सबूतों को नेस्तनाबूद कर देता है अथवा करने की जुगाड़ बनाने में जुट जाता है।’ वह गवाहों को प्रत्यक्ष धमकाता है अथवा अप्रत्यक्ष रूप से धमकी दिलवाता है। सभी साक्ष्यों को मिटा देता है और जरूरत पड़ने पर रातों-रात भूमिगत हो जाता है।
यह एक कटु सच है कि एक गैर जिम्मेदार अधिकारी की एक नासमझी (या सोची-समझी साजिश) पूरे न्याय तंत्र को पटरी से उतार देती है।
परिणामतः एक पत्रकार की जान पर सीधा खतरा पैदा हो जाता है। अपराधियों को यह बता देना कि, ‘अमुक पत्रकार आपकी पोल खोल रहा है, सीधे तौर पर उस पत्रकार की जान को खतरे में झोंकना है।’ यह अप्रत्यक्ष रूप से अपराधियों को सुपारी देने जैसा कृत्य है, ताकि सच की आवाज हमेशा के लिए दबाई जा सके।
सवाल यह उठता है कि यह एक लापरवाही है या ‘कुछ’ के चक्कर में किया गया संज्ञेय अपराध ? तो जवाब शायद यही होगा कि यह सिर्फ पेशेवर अकुशलता या लापरवाही नहीं है, बल्कि यह अपराधियों के साथ सीधी साँठगाँठ अर्थात गठबन्धन है।
स्मरण रहे कि, ‘जो अधिकारी अपनी कुर्सी पर बैठकर अपराधियों के मुखबिर बन रहे हैं, वे अपने ही पद की गरिमा के साथ बलात्कार कर रहे हैं।’ ऐसे भ्रष्ट तंत्र के चलते ही अपराधियों के हौसले बुलन्द हैं और आम जनता का न्याय प्रणाली से भरोसा उठ रहा है।
यदि अधिकारियों को पत्रकारों से इतनी ही नफरत है और अपराधियों से गहरा याराना है, तो उन्हें अपनी सरकारी कुर्सियाँ छोड़कर सीधे अपराधियों के गिरोह में शामिल हो जाना चाहिए। कम से कम तब जनता को यह तो पता होगा कि, ‘दुश्मन सामने खड़ा है, पीठ पीछे वार करने वाला कोई गद्दार नहीं!’

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